परिवर्तन

तेज किरणों को घटा घेर आयी थी 

मानो एक काली छाया फिर छायी थी 

जननी के सीने मे दर्द किया चिंगारी थी 

भाई के आसूं मे भड़की अग्नि थी 

बाप के चेहरे पे छायी डर अनजानी थी 

बेटी उसकी हाय लहू मे जो सनी थी 

दरिंदे मिल उसके जिस्म मे लूट मचाई थी 

हैवानो ने गर्भ उसकी चीर रखी थी 

होठों से मधुर वाक्य बोला करती थी 

शुष्क  पंखुड़ी सी कहीं सुखी पडी थी 

कलाई मे जो उसकी कभी चुडिया सजनी थी 

रौंध दी गई थी सुईओ से अब उनसे खून चढ़ानी थी 

वो चीख रही थी चिल्ला रही थी 

पूरी क्षमता से अपनी वो छटपटा रही थी 

वो बहन मेरी खून किया आंसू रो रही थी 

पीछे पड़े भेडियो के बच कर भाग रही थी 

कोमल पाओ कि चमड़ी उसकी उधड रही थी 

दर्द उसकी देख समाज

वो अपनी बेबसी मे डूबी थी... 

लिबास उसकी इत्र के महक से महकती थी 

हैवानो के चारे के लिए टुकड़ों मे फाड़ दी गयी थी 

बारी बारी दानवो ने अपबित्रता की कांड रचि थी 

रेत से चिपकी गीली बदन उसकी... 

वो अब मिट्टी हो चुकी थी.. 

 

दुनिया अब देख उसकी दसा तुझे राय देनी है

कायरता मे बदल गयी उनकी झूठी मर्दानगी है... 

चीर नारी के लिबास, लहूलुहान कर उसे... 

उन्हें वीरता दिखानी है !!

छी रे छी..  ये उन मर्दों की नामर्दानगी है... 

 

पर फर्क एक से सबको कहाँ पड़नी है.. 

जब तक हमारी बहन बेटी शिकार ना बने 

हमें क्यों लड़नी  है?? 

हमारी इसी चुप्पी, अनदेखेपन को 

एक और जान लेनी है... 

एक और बाप को ऐसे ही 

अपनी चाँद को मुख़ाग्नि देनी है... 

 

नारी अब ये रोज़ की कहानी है 

तुझ पर जुल्म की गाथा अब 

अब ना अनसुनी ना अनजानी है.. 

फिर भी ना देगा साथ कोई, लड़ाई ये तेरी है 

खुद पर तू कर विस्वास, शक्ति की तू देवी है.. 

 

लिखे आज ये सपूत तेरा, भाई तेरा, बंधु तेरा... 

ले प्रण तू ऐसी ना होंगी अब किसीकी हाल 

उठे जो कोई साया तुझपे.. 

बन काली उसकी छाती चीर डाल... 

 

नारी तू माँ है, तू जीवन की आधार है.. 

पर भूल मत...

तू रणचंडी की वो घातक अवतार है 

अपनी साहस, शक्ति, तीव्रता की झंकार कर... 

राक्षसों की हवस पर तू प्रचंड प्रहार कर... 

नारी उन पापी नारों की फिरसे तू नरसंहार कर... 

                                     -Bibaswan


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