"चाय!"
जो
बातें इतनी होती हैं
चाय पर,
तो
क्यूँ न दो बातें
हों "चाय" पर?
देखो
आखिर तो क्या है
चाय में, यही कुछ
आम सी चीजें। चाय
की पत्ती, दूध, चीनी, पानी
बस इतनी सी ही
तो बात है। पर
जो लगाओ दिल चाय
से, तो समझ आता
है अदरक, इलायची, दालचीनी ये सब भी
तो आते हैं उस
एक चुस्की में। यानि साहब,
देखें तो मिलता जुलता
सा है चाय जिन्दगी
से। बाहर से देखो
तो बस वही काम
धाम, हिसाब किताब, लेन देन, सोना
उठना, हंसना रोना, पर जो हो
दिल्लगी जीने से, तो
तमाम एहसास, गिले शिक़वे, प्यार,
मोहब्बत, शिद्दत, फितूर, उरूज़, जवाल, सफ़र, ठहराव... ये
सब भी तो हैं
हिस्सेदार ज़िन्दगी के।
तो
जब इतनी गहराई तक
समझा गया है जान
को, जिन्दगी को... तो फिर चाय
को क्यों नहीं भला?
उनको
होती है शक़ इश्क़
की
तुम्हारे
मुस्कुराहट की मुड़ाव से
बीबास,
बताओ
उन्हें ये असर-ए-महबूब नहीं,
बस
दिल्लगी है तुम्हें चाय
से बीबास।
हाँ
और भला हो भी
क्यूँ न। सवेरे सवेरे
रात की नशा हटाती
है चाय। मानों जैसे
किसी अपने ने बड़े
प्यार से नींद से
उठाया हो आपको। दिन
की पहली चाय एक
एहसास है पर्दा खुलने
का, धूप से चेहरे
के दीदार होने का, और
है सुकुन उस चाय में
किसी के पल्लू की
आड में खुलते आंखों
की भी। यानि दिन
की वो पहली चाय,
उसकी गर्माहट... छवि है किसी
के साथ होने की,
एक मीठी आवाज़ सी
है उस गर्म चाय
की पहली चुस्की में,
जो बड़े प्यार से
अपने आंचल में मेरे
आँखों को ढके कहती
है "उठा जाओ सवेरा
हो आया है।"
और
देखिए न कितनी ख़ूबसूरत
बात है ये चाय
की, भले आपके घर
में हो हालात गोबी
के पराठों की या हों
कुछ बासी रोटियों कि,
चाय ने बिन सवाल
के दोनों को अपनाया है।
ऐसा नहीं कि वो
बस ठीक लगती हो
गरम पराठों के साथ, साहब
उसने साथ तो बख़ूबी
दिया न बासी रोटियों
कि भी। चाय उस
एक आशिक़ की भांति है
जो न जात समझे,
न हालात समझे, रंग समझे, न
भाषा समझे, काम उसका बस
एक, अपने प्यार को
बड़े प्यार से पा लेना।

Comments
Post a Comment