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"चाय!"

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                                                       जो बातें इतनी होती हैं चाय पर ,  तो क्यूँ न दो बातें हों " चाय " पर ?    देखो आखिर तो क्या है चाय में , यही कुछ आम सी चीजें। चाय की पत्ती , दूध , चीनी , पानी बस इतनी सी ही तो बात है। पर जो लगाओ दिल चाय से , तो समझ आता है अदरक , इलायची , दालचीनी ये सब भी तो आते हैं उस एक चुस्की में। यानि साहब , देखें तो मिलता जुलता सा है चाय जिन्दगी से। बाहर से देखो तो बस वही काम धाम , हिसाब किताब , लेन देन , सोना उठना , हंसना रोना , पर जो हो दिल्लगी जीने से , तो तमाम एहसास , गिले शिक़वे , प्यार , मोहब्बत , शिद्दत , फितूर , उरूज़ , जवाल , सफ़र , ठहराव ... ये सब भी तो हैं हिस्सेदार ज़िन्दगी के।     तो जब इतनी गहराई तक समझा गया है जान को , जिन्दगी को ... तो फिर चाय को क्यों नहीं भला ? ...